मंगल ग्रह
खगोल परिचय
मंगल ग्रह का व्यास 6800 किलोमीटर है। यह सूर्य से 23 करोड़ किलोमीटर की औसत दूरी पर रहता है। 24 किलोमीटर प्रति सैकिण्ड की औसत चाल में यह सूर्य के गिर्द 687 दिन में पूरा चक्कर लगा लेता है। अपनी धुरी पर एक चक्कर लगाने में इसे 25 घण्टे लगते हैं। मंगल के फोबोस तथा डेमोस नामक दो छोटे-छोटे उपग्रह भी हैं।
पौराणिक वर्णन
पुराणों के मत से मंगल नवग्रहों में से एक है। इन्हें अंगारक, भौम और कुमार भी कहते हैं। ब्रह्माण्ड पुराण 2/23/84, मत्स्य पुराण 93/10, 127/4, विष्णु पुराण 2/12/18 में इसका वर्णन किया गया है। इनके स्वर्णमय रथ में 8 घोड़े रहते हैं। यह ग्रह सौर मंडल में पृथ्वी के बाद पड़ता है। यह पुरुष स्वभाव, क्षत्रिय एवं क्रूर प्रकृति वाला है।
कार्तिकेय अनुरूपाय सुरूपाय नमः नमः (पद्मपुराण 1/24)
यह लाल रंग की वस्तुओं का स्वामी है। मंगल देवसेनापति स्वामी कार्तिक के दूसरे रूप हैं। यहाँ तक कि महाभारत में मंगल का जन्म भगवान् कार्तिकेय के शरीर से ही हुआ माना गया है।
ततः शरीरात् स्कन्दस्य पुरुषः पावकप्रभः भक्तुम् प्रजा सः भर्त्तानाम् तिष्यपात महाग्रहः (महाभारत 3/19/24)
ब्रह्मवैवर्त पुराण (1/9/21) के मत से मंगल की माता पृथ्वी तथा पिता विष्णु भगवान् हैं।
उपेन्द्र बीजात पृथ्वयाम तु मंगलः समजायतः।
ये मान्यता स्कन्द पुराण में भी स्वीकारी गई है कि मंगल का जन्म भगवान् विष्णु के पसीने की बूंद से पृथ्वी द्वारा हुआ था। वामन पुराण के अनुसार मंगल का जन्म तब हुआ था जब भगवान् शिव ने महासुर अंधक का वध किया था। पद्मपुराण के अनुसार दक्ष यज्ञ विध्वंस के समय शिव के पसीने की बूंद से वीरभद्र का जन्म हुआ जिसने सभी पाताल मार्गों से गुजरते समय सातों समुद्रों को जला डाला। बृहस्पति के सम्मान में किये गये दक्ष यज्ञ का नाश करने के उपरान्त शिव ने वीरभद्र को पृथ्वी से दूर हट कर मंगल के रूप में रहने का आदेश दिया। यूनानी गाथाओं में मंगल (मार्स) और शुक्र (वीनस) की प्रेम कथाएं भरी पड़ी हैं। बेबीलोन की गाथा में मंगल को क्रूर प्रभाव वाला बताया गया है, इसे नूमिया के नाम से पुकारा जाता था।
मंगल को पृथ्वी का पुत्र भौम माना जाता है, अतः इसका एक नाम भौम भी है। यह शक्ति का प्रतिनिधि है। ऐसी शक्ति जो सूर्य और चन्द्र रूपी माता पिता से उत्पन्न जीवन को चलायमान रखती है। शक्ति रूप होने के कारण इसे देवताओं का सेनापति माना गया है।
मंगल से प्रभावित व्यक्ति
मंगल तरुणावस्था का, लाल वर्ण, अग्नि जैसी कांति वाला होता है, केश घुंघराले चमकीले होते हैं। छोटा कद, पेट छोटा, कमर पतली और छाती का भाग उभरा हुआ होता है। उसकी क्रोध भरी दृष्टि होती है। लालिमा लिए आँखें शेर जैसी डरावनी और खूंखार होती हैं। दोनों होंठ एक समान होते हैं। तमोगुणी, चंचल, साहसी, परन्तु उदार और दानी स्वभाव का होता है। पित्त प्रकृति होती है। शत्रुओं का नाश करने में निपुण होता है।
यदि मंगल अशुभ हो तो हर जगह मरने मारने को तत्पर, दहाड़ने जैसी आवाज़ वाला तथा मनहूस होता है।
शरीर पर प्रभाव
शरीर से मज्जा, रक्त, जिगर, होंठ, पेट, छाती, बाजुओं पर इसका अधिकार है। बल, पराक्रम, गर्व, साहस, रजोदर्शन, कामवासना की तेज़ी, क्रोधी, झूठ, द्वेष, परनिंदा आदि क्रियाएं यह संचालित करता है। शुभ मंगल राजा और प्रजा दोनों के लिए कल्याणकारी होता है, परन्तु अपने अशुभ समय में यह लूटपाट, हत्या, युद्ध, आतंकवाद के रूप में दोनों को हानि पहुँचाता है।
राशि और ग्रह संबंध
| गुण | मान |
|---|---|
| स्वराशि | मेष, वृश्चिक |
| उच्च राशि | मकर |
| नीच राशि | कर्क |
| मित्र ग्रह | सूर्य, चन्द्र, गुरु |
| शत्रु ग्रह | बुध, केतु |
| सम | शुक्र, शनि, राहु |
उपाय
पद्मपुराण के मत से मंगलवार को स्वाति नक्षत्र में पूजन करने से एवं मंगल के 21 नामों का पाठ करने से जातक ऋण से मुक्त होकर धनी हो जाता है।
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