पहला भाव — Tanu Bhav
स्वयं, शरीर, व्यक्तित्व
लग्न
प्रथम भाव को लग्न कहते हैं। लग्न में पड़ी राशि का स्वामी लग्नेश कहलाता है। यह कुंडली का सबसे महत्त्वपूर्ण भाव है: जातक से संबंधित प्रत्येक वस्तु के लिए इस भाव को अवश्य देखा जाता है। यदि लग्न और लग्नेश ही बलहीन हों तो सभी भावों का फल मध्यम पड़ जाता है।
इस भाव का कारक: सूर्य
इस भाव का कारक सूर्य है। सूर्योदय के समय सूर्य लग्न भाव में रहते हैं।
पौराणिक कल्पना में पूर्वी क्षितिज पर सूर्य के प्रकट होने को सूर्य का जन्म माना जाता है। इसलिए सूर्य के प्रथम दर्शन कराने वाले भाग का विषय भी जन्म माना गया है। जन्म के समय क्योंकि जातक का सिर पहले दिखाई देता है, इसलिए शरीर के सिर वाले भाग को इस भाव में स्थान दिया गया है।
प्रथम भाव में बली राशियाँ
मिथुन, कन्या, तुला और कुंभ राशियाँ प्रथम भाव में बली मानी जाती हैं।
पुरुष भाव
प्रकृति ने स्त्री से पुरुष को बाह्य तौर पर अधिक बलवान तथा घर से बाहर काम करने योग्य बनाया है। जैसे सूर्य क्षितिज से ऊपर आकर जगत् को प्रकाश देने का कार्य करता है, उसी प्रकार यह दायित्व घर-परिवार में सामान्य तौर पर पुरुष को दिया गया है। अतः प्रथम भाव को पुरुष की संज्ञा दी गई है।
प्रथम भाव के मुख्य विषय
इस भाव के मुख्य विषय ये हैं:
- जातक का शरीर, वर्ण और आकृति
- सिर और मस्तिष्क
- रंग, रूप और कद
- शक्ति, गुण और बल
- आरोग्य और आयु
- परोपकारिता
- बैठक और सिंहासन
- खड़े सींग वाले पशु
- वर्तमान समय
- जड़ी-बूटी
- पूर्व दिशा
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