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गुरु पहला भाव में

Tanu Bhavस्वयं, शरीर, व्यक्तित्व

शुभ फल

जातक सुखी, सुशील, विद्वान, मनोहर, रूपवान शरीर वाला, दीर्घायु, कई गुणों वाला, भाग्यवान, उदार, धीर व स्थिर प्रकृति का होता है। वह सुंदर वेश-भूषा व घी वाले पदार्थों के सेवन का शौकीन होता है। राज्य से भी मान सम्मान व राजकृपा प्राप्त करता है। विरोधियों पर विजय पाता है। समाज में पूजित होता है। स्वयं राजा तुल्य प्रतापी होता है। उच्च विद्या में रुचि होती है। शिक्षा विभाग से धन पाता है। वह साहित्य, विशेषकर धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करता है। व्याकरण-शास्त्र में भी रुचि होती है। समृद्ध जीवन व उत्तम घर का स्वामी होता है। ऐसा जातक अंतःप्रेरणा से अपना धन यज्ञ, दान आदि शुभ कृत्यों में व्यय करता है। इसके कई दीर्घायु पुत्र होते हैं। पत्नी की ओर से भी सुख व प्रसन्नता प्राप्त होती है। धार्मिक कृत्य, ध्यान, तपस्या आदि करने वाला होता है। श्रेष्ठ साधु बनता है। उसका दिया आशीर्वाद कभी व्यर्थ नहीं जाता। मृत्यु के बाद भी जातक स्वर्गलोक को जाता है।

अशुभ फल

जातक कोमल शरीर वाला होता है। यदि गुरु पर क्रूर ग्रहों की दृष्टि हो, तो शरीर में पीड़ा होती है। जीवन में कभी-कभी झूठी अफवाहों से कष्ट पाता है। नीच या शत्रु राशि में गुरु होने पर जातक कृतघ्न, चंचल-मति, विद्याहीन, व्यभिचारी व घमंडी होता है और नीच कर्म करता है। पुत्रहीन होता है। जीवन के छठें या बारहवें वर्ष कष्ट भोगता है। दूसरों का बुरा सोचने से स्वयं भी बरबाद हो जाता है।

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