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गुरु ग्रह

खगोल परिचय

सभी ग्रहों में गुरु सबसे बड़े आकार के हैं। इनका व्यास लगभग डेढ़ लाख किलोमीटर है। ये सूर्य से औसत 78 करोड़ किलोमीटर की दूरी पर रहते हैं तथा 13 किलोमीटर/सैकिण्ड की औसत चाल से सूर्य के गिर्द लगभग 12 वर्षों में एक चक्कर पूरा करते हैं, परन्तु अपनी धुरी पर पूरा धूम जाने में इन्हें केवल 10 घण्टे ही लगते हैं।

गुरु के 14 उपग्रह हैं। इनमें 4 बड़े उपग्रहों के नाम इओ, यूरोपा, गेनिमीड, कलिस्ती हैं, जो कि पहली बार वर्ष 1610 में गेलिलियो द्वारा देखे गए।

पौराणिक वर्णन

वायु पुराण (२/१९, ३/५, ३८/४४) के अनुसार बृहस्पति अंगिरा ॠषि के पुत्र हैं। इनके पिता का नाम सुनीमा भी बताया गया है। यह देव गुरु हैं। ॠग्वेद के अनुसार इनके सात मुंह, सुन्दर जीभ एवं हाथ में धनुषबाण व स्वर्ण पशु रहता है। यह बुद्धि तथा उत्तम वाक्‍शक्ति के स्वामी हैं। पुराणों के मत से इनकी 12 किरणें हैं। इनका रथ स्वर्ण का है जिसे वायु वेग वाले 8 श्वेत या लाल रंग के घोड़े खींचते हैं। वायु पुराण (५३/९७) के मत से इनका स्थान मंगल से ऊपर तथा शनि के नीचे है। इनकी बहन का नाम योग-सिद्धा बताया जाता है।

पुराणों में देव गुरु बृहस्पति एवं दैत्य गुरु शुक्र समकक्ष माने जाते हैं। शतपथ ब्राह्मण (६/७/९) के अनुसार इन्द्र द्वारा देव गुरु बृहस्पति का अपमान कर डालने पर यह देव सभा स्वर्ग से चले गये थे, तब असुरों ने अपने पुरोहित गुरु शुक्र के नेतृत्व में देवों पर अधिकार कर लिया था। एक अन्य कथा में दैत्य गुरु शुक्र शिवजी के निर्देशानुसार सिद्धि की तपस्या के लिए 10 वर्षों तक इन्द्र पुत्री जयन्ती के साथ गुप्त रूप से रहे थे। इस अवधि में बृहस्पति ही शुक्र का रूप धर उनके स्थान पर दैत्य गुरु बने रहे और उन दिनों देवों ने दैत्यों का नाश कर डाला, यहां तक कि भगवान् विष्णु ने शुक्र की माता को भी मार दिया, जिससे रुष्ट होकर शुक्र के पिता भृगु ने विष्णु जी को सात बार जन्म ग्रहण करने का शाप दिया था।

गुरु आकार में ग्रहों में सबसे बड़ा है। यह ग्रह ज्ञान और विद्वानों का प्रतीक है। यही ग्रह हमारे भाग्य और धर्म का स्वामी भी है। हृदय में अज्ञान (गु) का यह नाशक (रु) है। इसी कारण से देवताओं में बृहस्पति को देव गुरु का स्थान दिया गया है।

गुरु से प्रभावित व्यक्ति

गुरु का पीला वर्ण, लम्बा और स्थूल शरीर, अधिक मांस तथा चर्बी वाला होता है। केश कुछ भूरे होते हैं। नेत्र भूरे, छाती उभरी, पेट बड़ा होता है। गुरु प्रधान जातक का माथा कभी तंग (छोटा) नहीं होता, और नाक कभी छोटी या कटी नहीं होगी। वाणी शेर की तरह गम्भीर प्रभावशाली होती है। गुरु की प्रकृति कफ प्रधान है।

सत्तोगुणी, श्रेष्ठ बुद्धि तथा उत्तम विचार शक्ति, स्थिर स्वभाव होता है। जातक न ही रूखा न ही प्रीति वाला होता है, पर धर्म पर मिटने वाला होता है। परन्तु आदत से लापरवाह होता है। राज चिन्हों से सम्पन्न, शास्त्र निपुण, विद्वान होता है।

दूषित गुरु जातक को अभिमानी बना देता है; ज्ञानहीन होकर भी दूसरों पर बेकार में अपना प्रभाव डालता है। अच्छी भली संस्थाओं में घोटाला करना दूषित गुरु का ही काम होता है।

शरीर पर प्रभाव

शरीर में फेफड़े, गर्दन, नाक, चर्बी पर इसका अधिकार है। कर्मभाव, ज्ञान, विवेक, दूरदर्शिता, नीति, गर्व आदि क्रियाओं को यह संचालित करता है।

खगोलीय विवरण

गुणमान
स्वराशिधनु, मीन
उच्च राशिकर्क
नीच राशिमकर
मित्र ग्रहसूर्य, चन्द्र, मंगल
शत्रु ग्रहबुध, शुक्र
समशनि, राहु, केतु

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