धनु राशि
- क्रम
- 9
- तत्व
- अग्नि
- स्वामी
- गुरु
खगोल परिचय
धनु राशि के अपने तारे बहुत चमकदार नहीं हैं परन्तु आकाश गंगा का मध्य भाग इस राशि में पड़ता है। इस राशि का आकार एक ऐसे जन्तु की तरह है जिसका धड़ से ऊपरी भाग मनुष्य जैसा और निचला भाग घोड़े जैसा है और उसके हाथ में धनुष है जिसके नाम पर इस राशि का नाम पड़ा है।
ताराओं की स्थिति के अनुसार इस राशि में दो नक्षत्र पूर्वाषाढ़ा एवं उत्तराषाढ़ा पड़ते हैं। परन्तु राशि और नक्षत्रों का हिसाब रखने के लिए इस राशि में मूल नक्षत्र व पूर्वाषाढ़ा सम्पूर्ण तथा उत्तरा अषाढ़ा का एक चौथाई भाग शामिल किया जाता है। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र एक ईंट के रूप में आकाश गंगा के पूर्वीय किनारे पर स्थित है बल्कि इसके दो तारे आकाशगंगा में ही पड़ते हैं और इसके उत्तरी तारे का नाम तुलसी है।
पौराणिक वर्णन
सर्वप्रथम ॠग्वेद में आकाश गंगा का नाम सोमधारा के रूप में आता है।
यथा- सोमस्य धारा पवते। (ॠग्वेद 9/80/1)
विशेषकर ॠग्वेद के नवम् मंडल में आकाश गंगा के बारे में बहुत सी मधुर कल्पनाएँ भरी पड़ी हैं। इसे देवमाता अदिति के रूप में सूर्य तथा अन्य देवताओं की माता बताया गया है।
माता देवानाम्। (ॠग्वेद 1/113/19)
यूनानी गाथाओं में यह राशि सैगीटेरियस के नाम से जानी जाती है। जो कि एक ऐसा सैन्टार (नरतुरंग) था। यानी एक ऐसा जन्तु जिसके कन्धे के ऊपर मनुष्य जैसा और शरीर घोड़े जैसा हो। एक कथा में शिरोन नामक सैन्टार पेलथन नामक गुफा में निवास करता था। जिसने कई यूनानी नायकों को विद्यादान दिया है। बाद में इसको आकाश में स्थान दिया गया और राशि में बने सैन्टार के मुख और धनुष की दिशा वृश्चिक की ओर हैं और पूँछ मकर राशि की तरफ है।
प्रत्येक रूप में यह राशि मानवीय और दिव्य तत्त्वों के बीच एक पुल का कार्य करती है। इसी कारण नवम् भाव को धर्मभाव भी कहा गया है, जो मानव-जीवन में दिव्यता का बीज फैलाता है।
प्रकृति
अग्नि वर्ण वाली इस राशि की आकृति हाथ में धनुष लिए ऐसे मनुष्य की तरह है, जिसके कमर के नीचे का भाग घोड़े जैसा है। इसका स्वामी गुरु है। केतु इसमें उच्च और राहु नीच होते हैं। शरीर में दोनों जांघों व नितंबों पर इसका अधिकार रहता है। पित्त प्रकृति वाली इस राशि का स्वभाव अधिकार प्रियता, मर्यादा और करुणा की वृद्धि करना होता है।
| गुण | मान |
|---|---|
| रंग | अग्नि वर्ण |
| आकृति | हाथ में धनुष लिए मनुष्य, कमर के नीचे का भाग घोड़े जैसा |
| स्वामी | गुरु |
| उच्च राशि | केतु |
| नीच राशि | राहु |
| शारीरिक अधिकार | दोनों जांघें और नितंब |
| प्रकृति | पित्त |
स्थान
यह राशि घुड़शाला, किला, छावनी, वाहन-स्थल, सड़कें, यज्ञ-भूमि, तीर्थस्थान, समतल भूमि और अदालत-कचहरी में निवास करती है।
वस्तुएं
हिरण, घोड़ा, पेट्रोलियम, विटामिन, लवण, अस्त्र-शस्त्र व धनुष।
प्रभाव
यदि जन्म या नाम राशि धनु हो तो जातक फुर्तीला, मोटी गर्दन, बड़े कान, बड़ी नाक व छोटे पैर वाला होता है। वह धार्मिक चित्त का देव-भक्त, स्पष्ट वक्ता, तपस्वी, निष्कपट और भाग्यवान होता है। उत्तम व्याख्यान देने वाला, काव्य साहित्य में पारंगत, अनेक कलाओं या व्यवसायों में प्रवीण होता है। राज सम्मान पाता है। नौकरी में विशेष लाभ कम ही होता है। कई तीर्थयात्राएं करता है। बल प्रयोग से कभी नहीं, लेकिन प्रीति दिखाने से वश में आ जाता है।
मेष, कर्क, सिंह व वृश्चिक राशि वालों से मित्रता रहती है, वृष, मिथुन, कन्या व तुला राशि वालों से अक्सर अनबन रहती है। अशुभ असर के समय जातक जिद्दी स्वभाव का और पर स्त्री आसक्त हो जाता है।
रोग
शरीर के जोड़ों में दर्द, घाव, गठिया, लकवा, टाइफाइड व स्नायु विकार।
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