मकर राशि
- क्रम
- 10
- तत्व
- पृथ्वी
- स्वामी
- शनि
खगोल परिचय
मकर राशि का आगे का भाग हिरण जैसा और पिछला भाग मछली जैसा दिखाई देता है। उत्तराषाढ़ा के तारे इसके सिरो भाग में पड़ते हैं। सिर के सींग पर दो तारे स्थित हैं जिसमें एक पीत वर्ण है। वास्तव में मकर मंडल के तारे अधिक चमकदार नहीं है और न ही इस राशि में किसी नक्षत्र के तारे पड़ते हैं। श्रवण और धनिष्ठा नक्षत्र जो इस राशि में माने जाते हैं वास्तव में इससे कुछ हट कर पड़ते हैं। धनिष्ठा का आधा भाग इसमें माना गया है।
जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो साथ ही उत्तरायण का आरम्भ होता है इसलिए मकर संक्रान्ति का बहुत महत्व माना गया है।
पौराणिक वर्णन
मकर को वरुण का वाहन कहा गया है। पद्मपुराण के अनुसार मकरासुर नामक दैत्य ब्रह्मा जी से वेद चुरा कर समुद्र में भाग गया था जिन्हें भगवान् विष्णु ने मीन अवतार धारण कर महासमुद्र के तल से निकाला था और उस असुर का संहार किया था।
पश्चिम कथाओं में इस राशि को केपरीकारन कहते हैं जिसका अर्थ है बकरा। यूनानी गाथाओं में पान नामक देवता द्वारा टाईफोन दैत्य के पतन की प्रसन्नता में छंलाग लगा देने पर पान देवता समुद्री बकरे के रूप में बाहर निकला जो आकाश में इस राशि के रूप में स्थित हो गया। एक अन्य गाथा में पान ने अप्सराओं को नदी में नहाते देख कर बकरे का रूप धारण किया था।
प्रकृति
हल्के लाल, पीले या भूरे रंग वाली इस राशि की आकृति मगरमच्छ जैसी होती है। इसके स्वामी शनि हैं। मंगल की यह उच्च और गुरु की नीच राशि होती है। शरीर के दोनों घुटनों, और शरीर के जोड़ों पर इसका अधिकार है। वात-प्रकृति वाली इस राशि का स्वभाव महत्त्वाकांक्षा और उच्च पद की इच्छा पैदा करना है।
| गुण | मान |
|---|---|
| रंग | हल्का लाल, पीला या भूरा |
| आकृति | मगरमच्छ जैसी |
| स्वामी | शनि |
| उच्च राशि | मंगल |
| नीच राशि | गुरु |
| शारीरिक अधिकार | दोनों घुटने और शरीर के जोड़ |
| प्रकृति | वात |
| स्वभाव | महत्त्वाकांक्षा और उच्च पद की इच्छा |
स्थान
यह राशि नदी, नाला, झरने, जल वाले जंगलों, तीर्थ, समुद्र का किनारा, द्वीप जैसे स्थानों में निवास करती है।
वस्तुएं
ईख, बेलें, इमारती लकड़ी, नौका, जहाज, मगरमच्छ व जल के अन्य जन्तु।
प्रभाव
यदि जन्म या नाम राशि मकर हो तो जातक सुंदर नेत्र, रूपवान, पतली कमर व काले केशों वाला होता है। वह धीर, विद्वान, सत्य, स्पष्टवक्ता, और तीव्र स्मरण शक्ति वाला श्रुतिधर होता है। उच्च पदाधिकारी, राजा का प्रिय होता है, लेकिन उसकी स्पष्ट नीति से कई शत्रु पैदा हो जाते हैं। ऐसे जातक की पत्नी सुन्दर और भरे शरीर वाली होती है। वह अपने बाल बच्चों को प्यार करने वाला और कुल की कीर्ति बढ़ाने वाला होता है।
वृष, मिथुन, कन्या, तुला व कुंभ राशि वाले मित्रता और मेष, कर्क, सिहं व वृश्चिक राशि वाले शत्रुता रखते हैं।
अशुभ असर के समय जातक आलसी, दंभी, क्रोधी और लोभी हो जाता है। अपने से हीन वर्ग की स्त्रियों से अवैध संबंध रखता है। कुत्ता आदि से भय रहता है। ऊंचाई से गिरने की आशंका रहती है।
रोग
घुटने में कष्ट, गठिया, जलभय, ठंड लगना, हिस्टीरिया, कोढ़ व त्वचा के रोग।
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