शनि ग्रह
खगोल परिचय
शनि का व्यास सवा लाख किलोमीटर के लगभग है। 10 किलोमीटर/सैकिण्ड की औसत चाल से, सूर्य से औसतन डेढ़ अरब किलोमीटर की दूरी पर रहकर यह ग्रह 30 वर्षों में एक चक्कर पूरा करता है।
अपने छल्लों के कारण प्रसिद्ध शनि ग्रह सौर मंडल के सबसे सुंदर ग्रह माने जाते हैं। आकार में गुरु के बाद इन्हीं का नम्बर आता है। अपनी धुरी पर घूमने में इन्हें केवल 9 घण्टे ही लगते हैं। इनके 10 उपग्रह हैं, जिनमें से टाइटैनस बुध जितना बड़ा है।
पौराणिक वर्णन
पद्म पुराण के मत से शनि सूर्य के पुत्र हैं जो उनकी छाया नामक पत्नि से उत्पन हुए थे। पिता की आज्ञा से यह ग्रह बने, अपनी पत्नी के शाप से क्रूर प्रकृति के हो गये। कथा है कि शनि की पत्नी चित्ररथ गन्धर्व की कन्या थी, जो उग्र स्वभाव की थी। एक बार शनि भगवान भजन में लिप्त थे कि वह ॠतु स्नानकर मदमाती ॠंगार कर उनके साथ रमण करने के लिए आई परन्तु शनि के द्वारा ध्यान न देने पर इसने उन्हें शाप दे दिया कि जिस पर तुम्हारी दृष्टि पड़े उसका नाश हो जाये।
शनि को प्राय: अशुभ फल देने वाला माना गया है, इनका वर्ण काला तथा इन्हें शूद्र माना जाता है। इनका वाहन गृद्ध या भैंसा है। सती की मृत्यु पर शोकाश्रु गिरने के कारण शनि कृष्ण वर्ण हुये थे। शनि के द्वारा लोगों को त्रस्त करने पर शिवजी ने दो राशियाँ इनके अधीन कर दी थी। इन्हीं की दृष्टि पड़ने देवी पार्वती के पुत्र गणेश जी का सिर कट कर गिर गया था। देवी के शाप से शनि को खन्ज रोग हो गया था। पुराण के अनुसार भावी युगों में शनि मनु का पद संम्भालेगें।
उपाय
शनि प्रदोष व्रत मास के कृष्ण पक्ष की त्रियोदशी शनिवार को हो तो किया जाता है। दिन में व्रत रखकर संध्या को भगवान् शिवजी की पूजा कर भोजन किया जाता है। भविष्योत्तर पुराण के मत से शनिवार को शनि की लोहे की प्रतिमा का गहरे काले रंग वाले फूलों से पूजन करें तो शनि का अरिष्ट दूर हो जाता है विशेषकर जब यह चतुर्थ, अष्टम या द्वादश भाव में हों।
फलित ज्योतिष में प्राय: शनि को दुखदाता और मारक प्रभाव वाला माना जाता है। पुराणों के अनुसार शनि का जन्म होते ही उसकी दृष्टि पिता के सूर्य पर पड़ने मात्र से ही सूर्य को कुष्ट रोग हुआ और उनका सारथी अरुण पंगु हो गया। परन्तु यही शनि अपने शुद्ध रूप में न्याय के उस विधान का प्रतीक है, जिसके आधार पर कर्म फल सिद्धांत कार्य करता है। अपने अशुभ रूप में भी वास्तव में वे उसी विधान का उपयोग, हमारे मन रूपी चंचल घोड़े को दुःख रूपी कोड़े द्वारा सही मार्ग पर चलाने में करते हैं।
शनि से प्रभावित व्यक्ति
शनि का शरीर रुखा श्याम वर्ण, लम्बा परन्तु दुबला पतला वृद्ध जैसा होता है। केश कठोर, मोटे, रुखे और कड़े होते हैं। नेत्र गढ़ेदार, पीले या भूरापन लिये लाल वर्ण या साँप की तरह गोल होते हैं। आँखें काफी देर बाद झपकता है। शनि लंगड़ा होता है। दाँत, नाखून मोटे होते हैं, भौंहें सीधी या भौहों पर बाल कम होते हैं। कान छोटे होते हैं। इसकी प्रकृति वात प्रधान है, तमोगुणी, क्रोधी, कठोर हृदय तथा मूर्ख होता है। धूर्त, पक्का हठधर्मी और बदले पर आ जाये तो शत्रु पर अचानक छा जाने वाला होता है। अपने शुभ समय में शनि तत्त्वचिंतक, प्राय: एकान्तवासी होता है।
शरीर में नसें, केश, दृष्टि, भवें, कनपटी, गंजा सिर पर इसका अधिकार होता है। गंभीर विचार, सावधानी, ध्यान, सकुंचित वृत्ति, धूर्तता, आलस्य, दुष्टता, दुःख, मरण आदि क्रियाओं को यह संचालित करता है।
राशि और ग्रह संबंध
| गुण | मान |
|---|---|
| स्वराशि | मकर, कुंभ |
| उच्च राशि | तुला |
| नीच राशि | मेष |
| मित्र ग्रह | बुध, शुक्र, राहु |
| शत्रु ग्रह | सूर्य, चन्द्र, मंगल |
| सम | गुरू, केतु |
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