Jyotish Zone

कुंभ राशि

क्रम
11
तत्व
वायु
स्वामी
शनि

खगोल परिचय

कुंभ मंडल पक्षीराज मंडल के दक्षिण में पड़ता है और इसमें भी अधिक चमत्कार तारे नहीं पड़ते। इस राशि में धनिष्ठा का आधा भाग, शतभिषा का पूर्ण भाग और पूर्वाभाद्रपद का तीन चौथाई भाग शामिल किया जाता है। शतभिषा नक्षत्र सौ के लगभग छोटे-छोटे तारों से बना है जो कि पूर्वाभाद्रपद से काफी दूर दक्षिण की ओर स्थित है। शतभिषा के बीच में कुंभस्य नामक नक्षत्र के नाम पर इस राशि का नाम पड़ता है।

पौराणिक वर्णन

कुंभ का पौराणिक संबंध सागर मंथन की महाकथा में मिलता है। सागर मंथन में सर्वप्रथम विष निकला था, अंत में भगवान् विष्णु के अवतार धन्वन्तरि अमृत कुंभ के साथ प्रकट हुए थे, उस कुंभ को असुर गण उठा ले गए थे, जिसको गरुड़ जी पुनः पृथ्वी पर ले आए। जिन-जिन स्थानों पर अमृत बिन्दु छलक पड़े वे सभी प्रदेश पुन:स्थल हो गए और आजकल वहीं पर कुंभपर्व मनाया जाता है।

ब्रह्माण्ड पुराण (3/35/42, 4/17/35, 4/30/4) के अनुसार ॠषि वशिष्ठ और अगस्त्य का जन्म कुंभ से हुआ था। इसी कारण इनका नाम कुम्भज भी है। अष्टांग योग मार्ग में प्राणायाम की एक अवस्था भी कुंभक के नाम से जानी जाती है।

यूनानी गाथाओं में इस राशि को ऐक्वेरियस कहते हैं जिसका अर्थ जल लाने वाला। एक बार देवराज जूपिटर ने किसी गडरिए की एक सुन्दर पुत्री को ज़बरदस्ती उठा लाने के लिए एकाविला नाम की चील को भेजा। बाद में एकाविला को आकाश में राशि स्थान दिया गया। उसके हाथ में कुंभ था जिसमें जल की बजाय अमृत रखा हुआ था।

प्रकृति

नेवले जैसी रंग वाली इस राशि की आकृति कंधे पर घड़ा लिए एक पुरुष के समान होती है। इसका स्वामी शनि है। इसमें कोई ग्रह उच्च या नीच नहीं होता। शरीर में दोनों पिंडलियों पर इसका अधिकार है। वात, पित्त, कफ त्रिदोष वाली इस राशि का स्वभाव धर्मारूढ़ रहना, मानवता के प्रति प्रेम बढ़ाना और शांत चित्त होना है।

गुणमान
रंगनेवले जैसा
आकृतिकंधे पर घड़ा लिए पुरुष
स्वामीशनि
उच्च राशिकोई नहीं
नीच राशिकोई नहीं
शारीरिक अधिकारदोनों पिंडलियाँ
प्रकृतित्रिदोष (वात, पित्त, कफ)

स्थान

यह राशि जल से भरे पात्रों में, प्याऊ, शराब खाना, जुआ घरों, भंडार-गृह, कुम्हारों की जगह और कुशा में निवास करती है।

वस्तुएं

सरोवर, जल से उत्पन्न पुष्प, कमल, जल के पक्षी, फल, पेट पदार्थ, शराब, आवास व अरिष्ट मादक द्रव्य।

प्रभाव

यदि जन्म या राशि कुंभ हो, तो जातक सुंदर नेत्रों वाला, दयालु शत्रुजित और उत्तम बुद्धि व दानी स्वभाव का होता है। धर्म-कर्म में तत्प और सभा-सम्मेलनों में भाग लेना पसन्द करता है। विद्या, कला और राजनैतिक कार्यों से लाभ कमाता है।

वृष, मिथुन, कन्या, तुला व मकर राशि वालों से मित्रता रहती है। मेष, कर्क, सिंह व वृश्चिक राशि वालों से विरोध रहता है।

अशुभ असर के समय जातक निर्धन, दुर्बल व अत्यंत कामी हो जाता है। परायी स्त्रियों और परधन में आसक्त रहता है। जलभय या शस्त्र से घात की आशंका होती है।

रोग

पेचिश, शस्त्र भय, पेट में ग्रंथि, खून की कमी, मोटापा, स्नायु रोग व गठिया।

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