वृश्चिक राशि
- क्रम
- 8
- तत्व
- जल
- स्वामी
- मंगल
खगोल परिचय
इस राशि के तारामण्डल आकाश में बहुत सुन्दर और आकर्षक दृश्य बनाते हैं अतः यह राशि आसानी से आकाश में बिच्छू रूप में पहचानी जा सकती है। यह आकाश का काफी बड़ा क्षेत्र घेरती है। विशाखा और अनुराधा के चार चमकदार सितारों से बिच्छू का मुँह बनता दिखता है और ज्येष्ठा के तारों से उसका पेट तथा मूल नक्षत्रों के तारों से उसकी डंक वाली गोलाकार उठी हुई पूँछ बनती है। इस राशि का सबसे मुख्य तारा इसके पेट में पड़ता है जो सूर्य से 285 गुणा बड़ा है और तीस हजार गुणा अधिक रोशनी देता है। वास्तव में तारों की स्थिति के अनुसार मूल नक्षत्र के तारे भी इसी राशि के अन्तर्गत पड़ते हैं। परन्तु मान्यता के अनुसार वृश्चिक राशि में अनुराधा व ज्येष्ठा नक्षत्र तथा विशाखा का अंतिम एक चौथाई भाग शामिल किया जाता है ताकि हर राशि में ठीक सवा दो नक्षत्र पड़ते रहे।
पौराणिक वर्णन
मिथुन से वृश्चिक राशि बल्कि धनु तक एक लम्बी हृद-सर्प नामक तारामण्डल छाया हुआ है। इस सर्प के सात सिर माने जाते हैं। विष्णु रूप सूर्य जब इन राशियों से गुजरते है तब देवशयन माना जाता है। यानी कि जैसे विष्णु भगवान् अनन्त नाग की शय्या पर विश्राम कर रहे हों।
यूनानी कथाओं में सूर्यदेव (अपोलो) के पुत्र फाईटओन को जब वह सूर्य का रथ चला रहा था तो एक बिच्छू ने डराया था। एक दूसरी गाथा में देव साम्राज्ञी जूनो के सिखाने पर ओरायन को बिच्छू ने डंक मारा था तब बाद में बिच्छू को आकाश में राशि स्थान दिलवा दिया गया। मिश्र की परम्परा में उनकी देवी आईसिस के साथी बिच्छू पाए जाते हैं।
प्रकृति
सोने जैसे रंग वाली इस राशि की शक्ल बिच्छू जैसी है। इसका स्वामी मंगल है। चन्द्र इसमें नीच होता है। कोई ग्रह इसमें उच्च नहीं होता। शरीर में इसका गुदा, लिंग, योनि, अंडकोश, मूत्राशय पर अधिकार है। कफ प्रकृति की इस राशि का स्वभाव निर्मल चित्त, दृढ़ प्रतिज्ञ व स्पष्टवादी होना है। दूषित रूप से यह हठ, दंभ, नाश और हिंसा को पैदा करती है।
स्थान
यह राशि बिल, छिद्र, पत्थर, छिपने की जगह, टीला, युद्धभूमि, खंडहर व तहखानों में निवास करती है।
वस्तुएं
ईख, आम, अनानास, पके फल, ताजी सब्जी, खालें, खाल के वस्त्र, विष (रसायन), खनिज पदार्थ, विस्फोटक सामग्री, सर्प, बिच्छू, छिपकली, नेवला।
प्रभाव
यदि जन्म या नाम राशि वृश्चिक हो तो जातक बड़ी छाती, बड़े नेत्रों व गोल जांघों वाला होता है। वह स्वालम्बी, पराक्रमी, परिश्रमी, शत्रुओं का नाश करने वाला होता है। उसके बहुत नौकर-चाकर होते हैं। युद्ध में कौशल दिखाता है। मान-सम्मान प्राप्त कर राजा का विशेष कृपा पात्र बन जाता है। जातक की पत्नी पतिव्रता होती है। स्वयं जातक की संभोग आदि में विशेष रुचि नहीं होती। विदेश से व व्यापार से लाभ कमाता है।
इस राशि के जातक के लिए मेष, कर्क, सिंह, धनु, मीन राशि वाले मनुष्य उत्तम रहते पर मिथुन और कन्या राशि वालों से विरोध रहता है। अशुभ असर के समय जातक क्रोधी, कलहकारी, नशेबाज, धोखेबाज, मित्रद्रोही, बनते कार्यों में विघ्न डालने वाला होता है। मृत्यु किसी लंबे रोग से होती है। चोर, शस्त्र व अग्नि से हानि की संभावना होती है।
रोग
शस्त्र से चोट, आपरेशन, कमर दर्द, रीढ़ की तकलीफ, बवासीर, खुजली, पेशाब का रुक जाना, फिरंग यानि गुप्त यौन रोग।
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