तुला राशि
- क्रम
- 7
- तत्व
- वायु
- स्वामी
- शुक्र
खगोल परिचय
तुला मंडल के मुख्य 5 तारे हैं जिसमें 3 समद्विबाहु त्रिभुज बनाते हैं। अन्य 2 तारे तुलादंड को उठाये दिखाई देते हैं। तुला राशि में चित्रा का शेष आधा भाग, पूर्ण स्वाति का क्षेत्र एवं विशाखा का 3/4 भाग शामिल माना जाता है। यथार्थ में विशाखा के सभी तारे लगभग तुला राशि में ही दिखते हैं।
पौराणिक वर्णन
तुला का उल्लेख वाजसनेयी संहिता (30/17) में मिलता है। शतपथ ब्राह्मण (11/2, 7, 33) में मनुष्य के पाप-पुण्य कर्मों को लोक-परलोक में तोले जाने का उल्लेख मिलता है। इसी आधार पर तुलादान की कल्पना की गई। तुला राशि का संतुलन सृष्टि चक्र के आकर्षण और विकर्षण के अद्भुत सृजनात्मक संतुलन पर ही टिका हुआ है जिसे यह राशि दर्शाती है।
प्रकृति
श्यामवर्ण वाली इस राशि की आकृति बाजार में बैठे हाथ में तराजू लिए हुए पुरुष जैसी है। इसका स्वामी शुक्र है। यह शनि की उच्च और सूर्य की नीच राशि है। शरीर में इसका कमर, वस्ति व गुर्दों पर अधिकार रहता है। इसका स्वभाव विचारवान्, न्यायप्रिय, ज्ञानप्रिय व राजनीति निपुण होता है।
स्थान
यह राशि शहर, बाजार, दुकानों, मंडी, आढ़त व्यापार केंद्रों, प्रतिष्ठानों, फैशन शो जैसे प्रसाधन स्थलों, अदालतों, भंडार गृहों व सार्वजनिक स्थलों में निवास करती है।
वस्तुएं
उड़द, तिल, बारीक सुन्दर वस्त्र, घी, सरसों, धन-सम्पत्ति, प्रसाधन सुगंधित पदार्थ इसकी वस्तुएं हैं।
प्रभाव
यदि जन्म या नाम राशि तुला हो तो जातक सुंदर, बलवान् शरीर, उठी नाक वाला, बुद्धिमान, विचारवान, सर्वमाननीय और राजा का प्रिय होता है। पिता, गुरु व देवता का भक्त होता है। कई तीर्थ यात्राएं करता है। जातक प्रबंध कार्यों में कुशल होता है। बड़ी-बड़ी संस्थाओं को स्थापित करने जैसे कार्यों में रुचि लेता है। जातक की ख्याति मृत्यु के बाद और भी बढ़ती है।
मिथुन, कन्या, मकर, कुंभ राशि वालों से मित्रता और कर्क, सिंह राशि वालों से शत्रुता रहती है। अशुभ असर के समय जातक क्रोधी और दुष्ट व व्यभिचारी हो जाता है। अल्प पुत्र वाला होता है।
रोग
उदर रोग, पथरी, गुर्दे के रोग, गठिया, पीठ व कमर में पीड़ा, पेशाब संबंधी रोग, त्वचा के रोग।
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