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शुक्र ग्रह

खगोल परिचय

शुक्र ग्रह का व्यास 12 हज़ार किलोमीटर है। यह सूर्य से औसत 17 करोड़ किलोमीटर की दूरी पर रहता है। सूर्य के गिर्द यह औसतन 35 किलोमीटर/सैकिण्ड की चाल से 225 दिन में एक चक्कर लगाता है। अपनी धुरी पर भी इसे पूरा घूम जाने में 243 दिन लगते हैं।

पौराणिक वर्णन

यह एक चमकदार ग्रह है जो सुबह या सायंकाल दिखता है। पुराणों के मत से यह कवि के पुत्र शुक्राचार्य हैं, जो दैत्यों के गुरु माने जाते हैं। मघा नक्षत्र से संबंध रखने के कारण इनका एक नाम मधाब् भी है अर्थात् मधा की संतान। यह महा-बुद्धिमान शुक्र ही योग के आचार्य हैं। इनकी पत्नी शतप्रभा हैं, जिससे इनकी पुत्री देवयानी जन्मी। शुक्र के तप से देवता भी एक बार घबराये। यहां तक कि अन्त में इन्द्र ने अपनी पुत्री जयन्ती को इनकी सेवा में भेजा, तब शुक्र ने अपनी तपस्या पूर्ण कर जयन्ती से विवाह किया था। शुक्र की पत्नी का नाम ख्याति भी प्राप्त होता है:

देवी धाता विधातारौ भृगो: ख्याति असूमन। श्रियम् च देव देवस्य पत्नी नारायणस्य भः॥ (विष्णु पुराण १/८/१६)

वामन अवतार के समय दैत्यराज बलि के कमण्डलु की टोंटी में यह बैठ गये थे ताकि राजा बलि सम्पूर्ण पृथ्वी वामन भगवान को न दे पायें। परन्तु वामन द्वारा सींख गोदने के कारण इनकी एक आँख फूट गई थी, अतः इन्हें काना भी माना गया है। स्कन्द पुराण के अनुसार इन्हें मृत संजीवनी विद्या प्राप्त हुई थी जिसे सीखने के लिए बृहस्पति का पुत्र कच इनके पास आया था; यह विद्या मृतकों को भी जीवित कर देती थी। इसके अतिरिक्त वीर्य को भी शुक्र कहा जाता है, अतः वीर्य में भी यह संजीवनी शक्ति विद्यमान है, जिसकी रक्षा कर जातक उत्तम लोकों को प्राप्त कर सकता है। इनका लोक शुक्र लोक है जो बुध लोक से ऊपर स्थित है। शुक्र ब्रह्मा जी की प्रेरणा से तीनों लोकों के जीवन की रक्षा के लिए वृष्टि, अनावृष्टि, भय तथा अभय उत्पन्न करने वाले हैं।

पुराणों में शुक्र के स्त्री, पुरुष दोनों रूप मिलते हैं। भृगु के यहां शुक्र ने स्त्री रूप (श्री) में जन्म लिया था। इन्हें लक्ष्मी सहज भी कहा गया है। सुबह चमकने वाले तारे के रूप में शुक्र असुर गुरु हैं तो सायंकाल चमकने वाले रूप में इन्हें रति यानी प्रेम की देवी माना गया है। उड़ीसा में कोणार्क मन्दिर में शुक्र ग्रह की स्त्री रूप में प्रतिमा मिलती है। पश्चिमी एशिया में भी देवी इश्तर यानि शुक्र के दो रूप मिलते हैं।

यूनानी गाथाओं में शुक्र को वीनस यानी रूप की देवी माना गया है। इस प्रकार मंगल और शुक्र प्रेम के देवता हैं। भारतीय पुराणों में कामदेव भगवान् विष्णु यानी देवी लक्ष्मी (शुक्र) की संतान माने जाते हैं। टाइफोन (शम्बर) असुर के निकलने पर शुक्र और काम ने नदी के जल में छलांग लगा दी थी और दो मछलियों ने इन्हें अपनी पीठ पर लादकर बचाया था। एक दूसरी मान्यता है कि इन दोनों ने असुर से बचने के लिए मछली का रूप धारण किया था। शायद शुक्र के मीन राशि में उच्च होने का रहस्य इसी गाथा में छुपा है।

शुक्र सभी ग्रहों में सबसे अधिक सुन्दर, शुभ्र, चमकीला है। यही कारण है कि इसे सौन्दर्य का प्रतीक माना जाता है। चन्द्र एक ओर स्त्री के मातृत्व का प्रतिनिधित्व करता है तो शुक्र स्त्री का दूसरा रूप दिखलाता है, जहां वह पुरुष के समकक्ष खड़ी उसकी संगिनी, सहयोगिनी बनती है। शुक्र स्त्री के पूर्णत्व का प्रतीक है जहां वह पुरुष से स्पर्धा करके अपने व्यक्तित्व को स्वयं निखारती है। परन्तु वही स्त्री मायाजाल में बंधन का कारक भी है। पुरुषों में असुरों के माया प्रधान होने के कारण ही शुक्र को असुरों का गुरु बनाया गया है।

शुक्र से प्रभावित व्यक्ति

शुक्र का शरीर श्याम वर्ण पर उज्जवल कांतिमान, सुंदर और आकर्षक होता है। उसके सभी अंग समअनुपात में होते हैं। सिर के केश काले और घुंघराले होते हैं। नेत्र विशाल और गोल होते हैं। शुक्र की प्रकृति वायु तथा कफ प्रधान होती है। रजोगुणी, सुखमय, मस्त, रसिक, मधुरभाषी तथा ऐश्वर्य प्रधान आरामपस्त स्वभाव का होता है। सौन्दर्य का पुजारी हर समय अपने को सुन्दर दिखाता रहता है। फैशन का शौकीन होता है।

दूषित शुक्र जातक को कामुक बनाकर चरित्रहीन बना डालता है और अंत में जातक समाज में मान-सम्मान खो बैठता है।

शरीर पर प्रभाव

गाना, वीर्य, लिंग, योनि आदि पर इसका अधिकार है। कामसुख, प्रेम, विवाह, वासना, मैथुन, ऐश्वर्य, संगीत, वादन, नृत्य, गायन आदि क्रियाओं को यह संचालित करता है।

खगोलीय विवरण

गुणमान
स्वराशिवृष, तुला
उच्च राशिमीन
नीच राशिकन्या
मित्र ग्रहबुध, शनि, केतु
शत्रु ग्रहसूर्य, चन्द्र
सममंगल, गुरु, राहु

उपाय

भविष्योत्तर पुराण के मत से शुक्रवार को ज्येष्ठा नक्षत्र होने पर शुक्र की पूजा करने से शुक्र ग्रह जनित अनिष्ट मिट जाता है, व्रती सुखी हो जाता है।

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