सूर्य ग्रह
खगोल परिचय
सूर्य वास्तव में एक तारा है, जिसकी संरचना अधिकतर हाइड्रोजन तथा हीलीयम नामक तत्त्वों से बनी है। इसका व्यास लगभग 15 लाख किलोमीटर है। पृथ्वी से इसकी औसत दूरी 15 करोड़ किलोमीटर है। अपनी धुरी पर सूर्य लगभग 30 दिनों में एक परिक्रमा पूरी करता है। सौर मंडल के अन्य ग्रहों को अपने चारों ओर घुमाता, स्वयं सूर्य आकाश गंगा के एक किनारे पर रह कर उसके केन्द्र की परिक्रमा करता रहता है। सूर्य का तापमान बाहरी स्तर पर 6000 डिग्री सेंटीग्रेड से लेकर केन्द्र में डेढ़ करोड़ डिग्री तक रहता है। विभिन्न प्रकार की किरणों द्वारा सूर्य अपने हर ओर ताप व प्रकाश फैलाता रहता है। उर्जा के इतने बड़े भंडार में अभी 30 अरब वर्षों तक प्रकाश बांटने की क्षमता बाकी है।
भारतीय ज्योतिष परम्परा में पाँचवी शताब्दी में आर्यभट्ट ने बताया था कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। परन्तु फलित ज्योतिष में पृथ्वी पर से देखने पर सूर्य आकाश मार्ग पर चक्कर लगाता प्रतीत होता है। सूर्य एक चक्कर एक वर्ष में पूरा करता है। सभी ग्रहों से करोड़ों मील दूर होने पर भी यही सूर्य सभी ग्रहों का तथा पृथ्वी का पोषण करता है और नियमबद्ध रूप से इन्हें अपने चारों ओर घुमाता है। इसी कारण से सूर्य को ज्योतिष में जगत का मित्र कहा गया है। वैदिक काल से ही सूर्य का विशेष महत्व माना जाता रहा है। हमारे जीवन का परम आधार सूर्य है। यही स्थावर जंगम सभी पदार्थों की आत्मा है।
पौराणिक वर्णन
पुराणों के मत से सूर्य, ॠषि कश्यप तथा अदिति के पुत्र हैं। ये आकाश के देवता हैं। इनका रथ 7 घोड़े खींचते हैं, जिनका रंग सूर्य की 7 प्रभात ज्योति जैसा है, यानि बैगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी, लाल। सूर्य के रथ में एक ही पहिया है जो सातो रश्मियों के एक साथ मिल जाने पर एक हो जाने को दर्शाता है। सूर्य का रथ कभी नहीं रुकता, अतः सृष्टि का कार्य नियमित रूप से बिना विश्राम इसके सहारे चलता ही रहता है। इनका सारथि अरुण हमेशा इनके साथ रहता है। इनकी पत्नी का नाम संज्ञा है जो विश्वकर्मा की पुत्री है। संज्ञा से इन्हें यम पुत्र तथा यमुना पुत्री मिली। इनकी दूसरी पत्नी छाया है जिससे शनि पैदा हुये।
सूर्य को पुरुष तथा चन्द्र को स्त्री ग्रह माना जाता है। क्षत्रियों के प्रधान वंश सूर्य वंश और चन्द्र वंश नाम से जाने जाते हैं। सूर्य चन्द्र रूपी जोड़े का संबंध उपनिषदों में मिलता है। प्रश्न उपनिषद के अनुसार प्रजापति ने रयि-प्राण नामक जोड़ा उत्पन्न किया, उसमें सूर्य पुरुष थे और चन्द्र स्त्री:
सः मिथुनम् उदपादयेतः रयिम चः प्रणम् च इति। एतो में बहुधा प्रजा करिष्यता: आदित्यः ह वे प्राण: रयिः एव चन्द्रमा (प्रश्न उपनिषद 1:4/5)
मार्कण्डेय पुराण के मत से भगवान् सूर्य ॠग्वेदमय ब्रह्मा हैं, यजुर्वेद के अधिष्टाता विष्णु एवं सामवेद की योनि शिव हैं। प्रातः ॠक रूप में, मध्याह्न यजुर् रूप और अपराह्न में साम रूप में; अतः ये त्रिमूर्ति रूप हैं। एक कथा के अनुसार सूर्य तीर्थ में इनको सब ग्रहों का आधिपत्य प्राप्त हुआ था।
सूर्य जिस दिन राशि बदलते हैं, उसे संक्रांति कहते हैं जो कि पवित्र दिन माना जाता है।
सूर्य से प्रभावित व्यक्ति
सूर्य शूर, गंभीर, प्रभावशाली रूप लिये है। इनका रंग गंदमी तांबे जैसा, कद मध्यम से कुछ अधिक, पर बहुत लम्बा नहीं होता। केश कम होते हैं। प्रबल सूर्य वाला अंगहीन नहीं होता। हड्डियां मज़बूत, शक्तिशाली और भुजाएं लम्बी होती हैं। शहद रंग वाली आँखों में शेर जैसी चमक परन्तु डरावनी नहीं होती। चेहरा लम्बा-चौड़ा होता है।
सतोगुणी, व्यसनों से दूर, संयमी स्वभाव का होता है। सूर्य की पित्त प्रकृति है, अतः तेजस्वी और गर्म स्वभाव के होते हैं परन्तु बाहर से भोलापन झलकता है। इंसानियत से भरा यह इरादे का दृढ़ और मेहनती होता है। इसका आदेश देने का स्वभाव होता है। प्रायः कम बोलता है।
परन्तु यदि सूर्य दूषित हो तो जातक घमंडी, दुष्ट, गप्पी, दयाहीन, झगड़ालू प्रकृति का होता है।
शरीर पर प्रभाव
सम्पूर्ण शरीर, विशेषकर दायाँ भाग, दायाँ नेत्र, दिल तथा हड्डियों पर इसका अधिकार रहता है। मन की पवित्रता, आत्मिक शक्ति, धैर्य, स्वास्थ्य तथा रोगों से लड़ने की शक्ति आदि क्रियाएं यह संचालित करता है।
रोग: दुर्बलता, अस्थिर चित्त, मस्तिष्क पीड़ा, पित्त ज्वर, क्षय, नेत्र कष्ट, कलेजे का दर्द, लाल कुष्ट।
खगोलीय विवरण
| गुण | मान |
|---|---|
| स्वराशि | सिंह |
| उच्च राशि | मेष |
| नीच राशि | तुला |
| मित्र ग्रह | चन्द्र, मंगल, गुरु |
| शत्रु ग्रह | शुक्र, शनि, राहु, केतु |
| सम | बुध |
उपाय
प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की सातवीं तिथि को, विशेषकर चैत्र मास में, विधिवत सूर्य उपासना करने से सूर्यलोक की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार चैत्र या कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्टी को सूर्य उपासना करने से उत्तम पुत्र की प्राप्ति होती है।
भारत में सूर्य नमस्कार या गायत्री मन्त्र से सूर्य उपासना बहुत प्राचीन काल से मिलती है। विश्व की अन्य सभ्यताओं में अधिकतर मैक्सिको तथा मिश्र देश में सूर्य की बहुत रूपों में पूजा होती थी। राज मन्दिर में सूर्य की प्रतिमा रखी जाती थी। यूरोप में भी ईसा धर्म से पूर्व मिथ्र (मित्र) सूर्य उपासना प्रचलित रही है, यूनानी गाथायें सूर्य देव (अपोलो) से भरी पड़ी हैं।
सूर्य मन्त्रजप, वन भ्रमण, गायत्री जाप, आदित्य हृदय स्तोत्र तथा रामायण के पाठ से प्रसन्न होते हैं।
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