सिंह राशि
- क्रम
- 5
- तत्व
- अग्नि
- स्वामी
- सूर्य
खगोल परिचय
इस राशि के तारा मंडल में मघा एवं पूर्वफाल्गुनी का पूर्ण भाग तथा उत्तराफाल्गुनी का प्रथम-चतुर्थ भाग पड़ता है। मघा, सिंह के अगले भाग पर और पूर्वफाल्गुनी सिंह के मध्य भाग का निर्माण करता है। उत्तराफाल्गुनी का योगतारा सिंह की पूंछ पर स्थित है। हृद-सर्प नाम का तारा मंडल सिंह राशि के नीचे पड़ता है। सिंह की पीठ पर के तारों से एक सिंह शावक की भी कल्पना की जाती है।
लोपाश सिंहम् प्रत्यञ्चम् अत्सा (ॠग्वेद 10/28/4)
इसमें उस तारे का वर्णन है जो सिंह के आगे भागता दीख रहा है। सिंह में 5 मुख्य तारे पीत वर्ण के पड़ते हैं। इसलिए इस राशि का रंग पांडु माना गया है।
पौराणिक वर्णन
विभिन्न सभ्यताओं में बहुत सी राशियों के नाम धीरे-धीरे बदलते रहे परन्तु सिंह उन राशियों में से एक है जिसके प्राचीन नाम ज्यों के त्यों अपना लिये गए हैं। यह नाम हरक्यूलिस के 12 पराक्रम में से एक नेमीन नामक सिंह के वध के सम्मान में रखा गया था। उससे भी पहले मिश्र में सिंह राशि के तारों की उपासना की जाती थी क्योंकि सूर्य के सिंहस्थ होने पर नील नदी में जल चढ़ जाता था।
प्रकृति
हल्के पीले धुएं के रंग वाली इस राशि की आकृति शेर जैसी होती है। इसका स्वामी सूर्य है। इसमें कोई ग्रह उच्च या नीच नहीं होते। शरीर में हृदय, जिगर, आमाशय व रीढ़ पर इसका अधिकार है। पित्त प्रकृति वाली इस राशि का स्वभाव स्वतंत्र, प्रेमासक्त और उदार चित्त होना है।
स्थान
यह राशि जंगल, किला, पर्वत, कंदरा, शान्त स्थल, योगशाला और हिंसक व दुर्गम भूमि में निवास करती है।
वस्तुएं
गेहूँ, धान, चीनी, दालें, छिलके वाले अनाज, गुड़, वृक्ष, चमड़ा, मांस, जंगली जानवर इसकी वस्तुएं हैं।
प्रभाव
यदि जन्म या नाम राशि सिंह हो तो जातक पुष्ट शरीर, विशाल नेत्रों वाला, धनवान, विद्वान, गौरवशाली, सत्यवादी, पराक्रमी, तीखे शासक स्वभाव का लेकिन उदार और दाता होता है। जीवन में प्रशासन आदि में उच्च पद प्राप्त करता है। भूमि से लाभ पाता है। शत्रुओं पर विजय पाता है। विदेश यात्राएं करता है।
मेष, मिथुन, कर्क, कन्या, वृश्चिक, धनु व मीन राशि वालों से उत्तम संबंध और वृष, तुला, मकर, कुंभ वालों से अक्सर शत्रुता रहती है। अशुभ असर के समय जातक घमंडी व हठी होता है।
रोग
आमाशय, जिगर, पेट के रोग, सिर, दांत, नेत्र, गले, माथे पर चोट, मानसिक व्यथा, अधिक ज्वर, दिल के रोग।
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